मंज़िल
- Zyphyr

- Feb 4, 2021
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Updated: Nov 23, 2025

ज़िंदा हूँ, जब एहसास हुआ,
और समझा ज़िंदगी एक राह है,
तो ठान चला इस राह पर,
अपनी मंज़िल की तलाश में,
ख़ामोश था, पर जोश था ।
कई मोड़ आये राह में,
ठोकरें भी मिली कई,
गिरा, उठा और चलता गया,
खामोश था, मदहोश था ।
रास्ते में खुशनुमा नज़ारे भी दिखे कई,
देखी बर्फीली हसीन वादियां,
और देखे फूल, जिन पे ओस था,
बस लगा फिरदौस था ।
पर ठोकरें न रोक पायी मुझे,
ना भटका किसी हंसीन नज़ारे से,
रुका नहीं , डगमगाता चला,
मंज़िल पहुंचने का जोश था ।
देखा अनदेखा कर दिया,
मंज़िल पहुँचने की चाह में,
और मैं चलता गया,
शायद मैं ही बदहोश था ।
जब चलते चलते थक गया,
और साँसें थमने लगीं,
राज़ तूने समझाया मुझे,
मंज़िल नहीं, रास्ता कोष था ।
फिर जब साँसें रुकी,
तब भी खामोश था ,
पर चेहरे पे मुस्कान थी,
और अब बस संतोष था ।


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